आचार्य श्री १०८
Acharya Shri 108 Shrey Sagar Ji Maharaj
राजस्थान के वागड़ अंचल के पाड़वा गांव, डूंगरपुर में ३० दिसंबर १९७३ को एक असाधारण बालक का जन्म हुआ — जिनका नाम था सुगंध कुमार जैन। श्री जोदावत हीरालालजी और स्वर्गीय श्रीमती केशर देवी के तीन भाई और तीन बहनों वाले परिवार में ये तीसरे क्रम में थे।
बाल्यकाल से ही उनके मन में वैराग्य की गहरी भावना थी। १०वीं कक्षा की पढ़ाई के बाद संसार की क्षणभंगुरता का बोध होते ही उनका मन मोक्षमार्ग की ओर मुड़ गया। इसीलिए उन्हें बाल ब्रह्मचारी की उपाधि प्राप्त है।
२५ अक्टूबर १९९७ को अश्विन शुक्ल चतुर्दशी पर आचार्य श्री १०८ वासुपूज्यसागरजी महाराज के सान्निध्य में ब्रह्मचर्य व्रत लिया। १९९८ में भागलपुर (बिहार) में सप्तम प्रतिमा प्रदान की गई। इसके पश्चात आचार्य वर्धमानसागरजी और आचार्य सुविधिसागरजी महाराज के सान्निध्य में दीर्घकाल तक आध्यात्मिक संस्कार प्राप्त किए।
लगभग २१ वर्षों की अखण्ड साधना के पश्चात, १६ अगस्त २०१८ को जैन महातीर्थ श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में भगवान नेमिनाथ जन्म-तप कल्याणक तिथि (श्रावण शुक्ल षष्ठी) पर मुनि दीक्षा ग्रहण की। उनकी असाधारण साधना देखकर मात्र ११ दिनों बाद — २७ अगस्त २०१८ को — आचार्य पद से विभूषित किया गया। यह जैन इतिहास में अत्यंत दुर्लभ संयोग है।
🙏 दुर्लभ संयोग — दीक्षा गुरु आचार्य श्री १०८ वासुपूज्यसागरजी महाराज ने श्रेय सागरजी को दीक्षा प्रदान करने के ठीक अगले दिन — १७ अगस्त २०१८ को — श्रवणबेलगोला में समाधि ग्रहण की। गुरु का अंतिम और महानतम कार्य अपने शिष्य को दीक्षित करना था।
श्री जोदावत हीरालालजी के घर सुगंध कुमार जैन का जन्म। तीन भाई, तीन बहनों वाले परिवार में तीसरी संतान।
जन्मभूमि: पाड़वा१०वीं तक पढ़ाई। बचपन से जिन मंदिर के प्रति गहरा आकर्षण। संसार की क्षणभंगुरता का बोध। बाल ब्रह्मचारी की उपाधि।
आचार्य श्री वासुपूज्यसागरजी महाराज के सान्निध्य में ब्रह्मचर्य व्रत। आध्यात्मिक यात्रा का औपचारिक शुभारंभ।
ब्रह्मचर्य व्रतरक्षाबंधन के पावन दिन सप्तम प्रतिमा की प्राप्ति। श्रावक जीवन से श्रमण जीवन की ओर महत्त्वपूर्ण कदम।
सप्तम प्रतिमाआचार्य वर्धमानसागरजी और आचार्य सुविधिसागरजी महाराज के सान्निध्य में आध्यात्मिक संस्कार। अखण्ड ब्रह्मचर्य साधना।
जैन महातीर्थ श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में भगवान नेमिनाथ जन्म-तप कल्याणक तिथि पर दीक्षा। गुरु: आचार्य श्री वासुपूज्यसागरजी महाराज।
मुनि दीक्षादीक्षा के अगले दिन आचार्य श्री वासुपूज्यसागरजी महाराज ने श्रवणबेलगोला में समाधि ग्रहण की। उनका अंतिम महान कार्य — शिष्य को दीक्षित करना।
गुरु समाधिमुनि दीक्षा के मात्र ११ दिनों में आचार्य पद — जैन परंपरा में अत्यंत दुर्लभ। अब आचार्य श्री १०८ श्रेय सागरजी महाराज।
आचार्य पदभजन, दोहे और मुक्तकों के माध्यम से जैन दर्शन को सरल और मधुर रूप में प्रस्तुत करने की विशेष प्रतिभा।
२४ वर्ष की आयु में ब्रह्मचर्य व्रत। लगभग २१ वर्षों की अखण्ड साधना के पश्चात दीक्षा।
पूजन, विधान और अनुष्ठान में गहरी रुचि एवं विशेष विशेषज्ञता।
मुनि दीक्षा के मात्र ११ दिनों में आचार्य पद — जैन परंपरा में अत्यंत दुर्लभ और असाधारण संयोग।
दोहे, मुक्तक और नवीन चिंतन की रचनाओं के माध्यम से धर्म को जनमानस तक पहुंचाने का प्रयास।
पाड़वा की धरा पर जन्म लेकर आचार्य पद की प्राप्ति। पाड़वा नगर का अभिमान।
परम पूज्य आचार्य श्री १०८ श्रेय सागरजी महाराज के भजन, प्रवचन और ग्रंथ — जल्द ही इस पवित्र पृष्ठ पर उपलब्ध होंगे।
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वीडियो भेजें →अत्यंत हर्ष और उल्लास के साथ सूचित किया जाता है कि इस वर्ष का मंगल चातुर्मास ससंघ परम पूज्य आचार्यश्री — जो स्वयं पाड़वा के सुपुत्र हैं — हमारे श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर जी, पाड़वा में संपन्न होने जा रहा है।
यह पाड़वा नगर के लिए एक ऐतिहासिक एवं अभूतपूर्व अवसर है। अपनी जन्मभूमि पर आचार्यश्री का चातुर्मास अत्यंत दुर्लभ एवं सौभाग्यशाली संयोग है।
आप सभी सपरिवार पधारकर धर्मलाभ लें।